IQNA

ख़ुसूसी संवाद /
17:58 - November 13, 2019
समाचार आईडी: 3474153
अंतर्राष्ट्रीय समूह- इस्लामिक धर्मों के सन्निकटन की विश्व सभा की सर्वोच्च परिषद के अध्यक्ष, ने इस बात पर जोर देते हुऐ कि इस्लामी उम्मा के दुश्मनों की औपनिवेशिक योजनाओं के प्रतिरोध को एकता और कुरान की निषेधाज्ञा के पालन की आवश्यकता र ज़ोर देते हुऐ कहाःकि कुछ विद्वानों और विज्ञान के भक्तों की कट्टरता मुसलमानों की एकता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाधा है।

IQNA की रिपोर्ट के अनुसार; ईरानी शिया धर्मगुरु, 27 महर 1323 को नजफ़ में पैदा हुए अयातुल्ला शेख मोहम्मद अली तस्ख़ीरी ज़ादह, विशेषज्ञों की विधानसभा के पांचवें कार्यकाल में तेहरान के प्रतिनिधि, इस्लामिक धर्मों के सन्निकटन की विश्व सभा की सर्वोच्च परिषद के अध्यक्ष और इस्लामी विश्व के मामलों में सर्वोच्च नेता के सर्वोच्च सलाहकार हैं वह इस्लामिक धर्मों के अनुमोदन के लिए विश्व सभा के पूर्व महासचिव और विशेषज्ञों की विधानसभा के तीसरे कार्यकाल में गिलान प्रांत के पूर्व सदस्य भी थे।
उनके बारे में और अधिक जानने के लिए, एकता के सप्ताह और पैगंबर मुहम्मद (PBUH) के जन्म के अवसर पर हमने इस्लामिक धर्मों के सन्निकटन पर विश्व सभा में उनके कार्यालय में एक दिन, मेहमान होगऐ। और हमने इस महान विचारक, टिप्पणीकार, लेखक और हमारे देश के शोधकर्ता और इस्लामी दुनिया में एकता के एक अग्रदूत के साथ विदेशों में इसकी गतिविधियों, इस्लामी धर्मों के सन्निकटन में अल-अजहर की भूमिका और मुस्लिम एकता की बाधाओं पर चर्चा की। यह बातचीत इस प्रकार है:
IQNA,आप अल-अजहर और इसकी तक़रीबी गतिविधियों के बारे में क्या सोचते हैं?
अल-अज़हर को शुरू से सन्निकटन को प्रेरित करने के उद्देश्य से बनाया गया था, और मिस्र पर शासन करने वाले फातिमीयों ने इस केंद्र की स्थापना की और उसमें सभी 5 इस्लामी धर्मों (शिया, शाफ़ई, हनफ़ी, मालिकी और हंबली) को पढ़ाया जाता था, लगभग 1940 ईस्वी तक। सन्निकटन का पर्चम अल-अज़हर के हाथ में था और इन वर्षों में एक सफल आंदोलन शुरू हुआ, और वह यह था कि अल-अज़हर के विद्वानों ने, क़ुम के विद्वानों के सहयोग से, दारुत-तक़रीब बैनल मज़ाहिब को बनाया और कुछ अच्छे काम किए। अल-अज़हर की रिसालतुल-इस्लाम पत्रिका और अल-अजहर में इमामी(शिया)न्यायशास्त्र की शिक्षा दारुत-तक़रीब के निर्माण के परिणामों में से थे।
IQNA,दारुत-तक़रीब अल-अजहर के भाग्य का क्या हुआ?
 
1940 से 1970 के शुरू तक नजफ़ और क़ुम में शिया और अल-अजहर के बुजुर्गों की मृत्यु के बाद, इस दारुत-तक़रीब की गतिविधियां समाप्त हो गयीं, और इस्लामी क्रांति और थोपे गए युद्ध की समाप्ति के बाद, सर्वोच्च नेता ने दारुत-तक़रीब मज़ाहिबे इस्लामी को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया लेकिन दारुत-तक़रीब के बदले, इस्लामिक धर्मों के सन्निकटन पर विश्व सभा की स्थापना की जो दारुत-तक़रीब काहिरा के समान लक्ष्यों को लेकर आग बढ़ा। हमने इस्लामिक धर्मों के सन्निकटन पर विश्व सभा की शुरुआत से पहले दारुत-तक़रीब काहिरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश की, लेकिन हम असफल रहे।
IQNA: आपको क्या लगता है कि वर्तमान युग में मुसलमानों की एकता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाधा क्या है?
इस संदर्भ में बात करने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन एक निष्कर्ष के साथ यह कहा जा सकता है कि धर्मों के सन्निकटन के लिए सबसे बड़ी बाधा कट्टरता है, कुछ विद्वानों या विज्ञान के आलोचकों का पूर्वाग्रह, और यह पूर्वाग्रह(ताअस्सुब) कुछ को मजबूर करता है कि दूसरों को फ़िर और फ़ासिक़ कहें और बिद्अत जारी करने का आरोप लगाऐं।
निकट्टता का एक अन्य कारक अज्ञानता है, कुछ मुसलमान का एक-दूसरे के धर्मों की सच्चाई को ना जानना है जब कि, अगर सब इकट्ठा हों सी समझ पर पंहुचे, तो उन्हें एहसास हो कि उनकी कामन बातें 90% तक है, लेकिन इस अज्ञानता ने अपना प्रभाव डाला है और हर ऐक दूसरे पर आरोप लगाता है, और यही बात एकता को रोके है।
 
अन्य कारक जो एकता में बाधा डालते हैं, मुस्लिम दुनिया पर मुसल्लत सरकारों के व्यक्तिगत हित हैं, वे कहते हैं, मुसलमानों की एकता उनके व्यक्तिगत हितों के खिलाफ़ है। इसी तरह, विश्व अहंकार और इस्लाम के दुश्मनों के लक्ष्य सन्निकटता और एकता के मुद्दे के विरोध में हैं, और वे कोशिश करते हैं कि निकट्टता व ऐकता से रोकें और मुसलमानों के बीच कोई सहमति न बने कि जब ये धार्मिक, राजनीतिक और भौगोलिक विभाजन उत्पन्न होंगे तो औपनिवेशिक ताक़ते अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर पाऐंगे।
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