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वकार रिजवी की चालीसवें की मजलिस को मौलाना वसी हसन खान ने किया खिताब
15:30 - June 08, 2021
समाचार आईडी: 3476010
तेहरान (एकना) लखनऊ। इंसान दुनिया से अल्लाह की बारगाह में चला जाता है लेकिन उसके किए गए काम लोग याद रखते हैं मशहूर उर्दू सहाफत के अलमदार, एक बेहतरीन जिंदादिल इंसान , उर्दू और हिंदी सहाफत को एक नई ऊंचाई पर ले जाने वाले, बेहतरीन सामाजिक कार्यकर्ता,

लखनऊ। इंसान दुनिया से अल्लाह की बारगाह में चला जाता है लेकिन उसके किए गए काम लोग याद रखते हैं मशहूर उर्दू सहाफत के अलमदार, एक बेहतरीन जिंदादिल इंसान , उर्दू और हिंदी सहाफत को एक नई ऊंचाई पर ले जाने वाले, बेहतरीन सामाजिक कार्यकर्ता, इंसानियत और क़ौम के मददगार सैयद वकार मेहंदी रिजवी की चालीसवें की मजलिस संपन्न हुई। जिसको
मौलाना वसी हसन खान साहब, प्रोफेसर वसीक़ा अरबी कॉलेज फैजाबाद ने खिताब किया।
मजलिस का आगाज कारी मोहम्मद अब्बास साहब के तिलावते कलाम ए पाक से हुआ।
तिलावते कलाम ए पाक के बाद सोज़खानी के फराइज जनाब शकील साहब और बरादरान ने अंजाम दिया।
सोज़खानी के बाद जनाब ज़िया इमाम साहब ने अपने तास्सुरात पेश किए। उसके बाद मौलाना वसी हसन खान साहब ने मजलिस को खिताब किया उन्होंने मजलिस का मौजू “शुक्रिया” बयान के लिए चुना जिस पर उन्होंने पढ़ा कि अल्लाह का हुक्म है कि नेमतों का शुक्रिया अदा करो। उन्होंने लोगों से सवाल किया कि क्या अल्लाह का शुक्र अदा किया जा सकता है अगर नहीं किया जा सकता है तो फिर अल्लाह ने शुक्र अदा करने का हुक्म क्यों दिया है?
मौलाना ने शेख सादी का जिक्र करते हुए कहा कि इंसान हर नेमत पर शुक्र अदा करें तो इंसान की सबसे बड़ी नेमत सांस है जिसमें वह एक बार सांस अंदर लेता है और दूसरी बार सांस बाहर छोड़ता है तो इसका मतलब यह हुआ कि हर वक्त वह सांस लेता रहे और शुक्र अल्लाह कहता रहे। मौलाना ने कहा के चौथे इमाम हजरत इमाम जैनुलाब्दीन अलैहिस्सलाम ने कहा कि या अल्लाह जब मैं तेरा शुक्र अदा करता हूं तो यह एहसास होता है कि शुक्र अदा करने की तौफीक भी तो तूने ही आता की है।
चालीसवें की इस मजलिस में डॉक्टर नय्यर जलालपुरी साहब, डॉक्टर असद अब्बास साहब मौलाना जाफर अब्बास साहब, मौलाना यासूब अब्बास, मौलाना मोहसिन साहब और दीगर शोअरा ए इकराम और चाहने वाले मौजूद थे।
वकार रिजवी एक ऐसा नाम था जिसके दिल में काम करने का जज्बा था कौम की तरक्की के लिए फिक्रमंद रहने वाले शख्स के दिल में क़ौम के लिए दर्द था।
अपनी जिंदगी में वकार रिजवी ने मुख्तलिफ इलाके में लोगों की मुश्किल के समय मदद की थी।
मौलाना ने मजलिस में जब मसायब बयान किए तो मसाएब सुनकर मौजूद लोग गिरिया करने लगे।

source:avadhnama

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