कुरान समाचार एजेंसी (IQNA) के अनुसार, साइट जानकारी अरबी "मुहीत"के हवाले से, "रफ़क़ह अहमद फिलिस्तीनी ने कहा: कि इस उम्र में लगता नही था कि मैं कुरान को याद कर लूंगी लेकिन भगवान ने शक्ति और इरादा मुझे दिया है कि इस रास्ते में मेरी मदद की.
उन्हों ने बात जारी रखते हुऐ बयान किया: चार साल पहले हिफ़्ज़े कुरान का उस मस्जिद की स्थापना के वक़्त जो हमारे पड़ोस में है शुरू किया ,मस्जिद मे तिलावत और तजवीद से की सभा आयोजित होती थी मैं उस समय कुरान सार्वजनिक रूप से पढ़ने जाती थी और मैं मस्जिद के बुनियादी तिलावत पाठ्यक्रम में भाग लेती थी, ता कि क़ुरान की सही तिलावत कर सकूं, और हिफ़्ज़ के बारे में सोचा नहीं था इस अवधि के बाद दूसरा चरण शुरू हुआ मगर कम रोशनी के कारण मैं इसमें भाग नहीं लेसकी.
उन्होंने कहा कि उस पल से हिफ़्ज़े कुरान का निर्णय लिया ता कि सब के लिए साबित करूं कि आंखों की समस्या के बावजूद कुरान को याद किया जा सकता हैं.
Rfqh अहमद ने जोर दियाः मस्जिद में तुर्कमेनिस्तान के हफ़िज़े कुरान थे मैं ने चाह यदि संभव हो तो मेरे हिफ़्ज़ पर मॉनिटर बन जाऐं उन्हों ने खुशी खुशी मान लिया और हमेशा प्रोत्साहित करते रहते और मैं भगवान के बाद इस सफलता पर उनकी क़रज़दार हूं.
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