इंटरनेशनल ग्रुप:रमज़ान के आखिरी शुक्रवार को क़ुदस दिवस के रूप में याद रखने से इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक,का उद्देश्य,मुसलमानों के पहले Qibla के नाम को जीवित रखना था और क़ुदस समारोह में मुज्तहिदीन(ayatollahs) की उपस्थिति फ़िलिस्तीनी मुद्दे की वैधता को दोगुनी कर देती है.
"अब्दुर्रसूल दरवेश"राजनीतिक विशेषज्ञ ने ईरानी कुरान समाचार एजेंसी (IQNA) के साथ एक साक्षात्कार में इस मतलब को बयान करने के साथ कहा, रमज़ान के आखिरी शुक्रवार को क़ुदस दिवस के रूप में याद रखने से इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक,का उद्देश्य,मुसलमानों के पहले Qibla के नाम को जीवित रखना था और यह सही कार्वाई उस वक़्त की गई थी जब यह मुद्दा मुसलमानों के मन से भुला दिया गया था.
उन्हों ने कहा:लगभग तीस साल तक कई देशों ने जहां अब लोकप्रिय जन आंदोलन ज़ोरों पर है; Qods दिवस समारोह आयोजित करने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि उन देशों पर सत्तारूढ़ तानाशाह इस दिन विरोध पर प्रतिबंध लगा देते थे लेकिन इस साल हम आशा रखते हैं कि यह दिन मिस्र जैसे राष्ट्रों के बीच धूम से आयोजित किया जाऐगा,और भविष्य के वर्षों में अन्य सारे देशों में इस दिन की यान मनाई जाऐगी कि अभी भी Qods दिवस समारोह नहीं मनाया जाता है.
अब्दुर्रसूल दरवेश ने इस बयान के साथ कि कहा कि Qods दिवस की याद दुनिया भर में इस्लामी केन्द्रों और संस्थानों के मुख्य कार्यों में से एक है, कहाः कि Qods के समर्थन में वैश्विक विरोध प्रदर्शनों का सकारात्मक प्रभाव और फ़िलिस्तीनी मुद्दे की रक्षा करने में सभी मुसलमानों की हरकत की ओर ध्यान देते हुऐ,कल्पना करता हूं कि धार्मिक विद्वान भी समारोह में भाग लेंगे है और न केवल कुछ ही लोग,वास्तव में क़ुदस समारोह में मुज्तहिदीन(ayatollahs) की उपस्थिति फ़िलिस्तीनी मुद्दे की वैधता को दोगुनी कर देती है.
अंत में इस राजनीतिक मामलों पर विशेषज्ञ ने कहा:फ़िलिस्तीनी मुसलमानों के बीच विभाजन डालना सऊदी अरब जैसे अरबी देशों के उद्देश्यों में से है इस लिऐ फ़िलिस्तीन की जनता अपनी सारे प्रयास व कोशिश एकीकरण पर खर्च करे ताकि टूटने को रोका जासके.
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