ईरानी कुरान समाचार एजेंसी (IQNA) सर्वोच्च नेता के कार्यालय की जानकारी डेटाबेस के अनुसार,16वें गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों का शिखर सम्मेलन कल सुबह, अयातुल्ला Khamenei इस्लामी क्रांति के सुप्रीम नेता की उपस्थित के साथ तेहरान में शुरू किया गया.
इस्लामी क्रांति के सुप्रीम नेता अपने महत्वपूर्ण भाषण में जो कि पांच महाद्वीपों के 120 देशों के अधिकारियों और शासकों व नेताओं के सामने दिया सदस्य देशों को इस अवसर से लाभ लेने असुरक्षा और युद्ध के वर्चस्व से दुनिया को बचाने में एक स्थायी ऐतिहासिक भूमिका निभाने पर दिया.
इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता के बयान का पूर्ण पाठ इस प्रकार है:
بسم اللّه الرّحمن الرّحيم
الحمد للہ ربّ العالمين و الصلاۃ و السلام علی الرسول الاعظم الامين و علی الہ الطاھرين و صحبہ المنتجبين و علی جميع الانبياء و المرسلين
आप प्रतिष्ठित मेहमानों को, गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के देशों के प्रमुखों, प्रतिनिधियों और विश्व सम्मेलन के अन्य प्रतिभागियों का स्वागत करता हूं.
हम यहाँ इस उद्देश्य से जमा हुए हैं कि परवरदिगार की नुसरत और निर्देश से इस अभियान और आंदोलन को कि छह दशक पहले कुछ दिलसोज़ और कर्तव्य-जागरूक राजनीतिक नेताओं के बुद्धिमत्ता, स्थिति के आकलन और बेबाकी के परिणामस्वरूप जो काम शुरूआत हुआ था, दुनिया की समकालीन आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार उसको अग्रेषित करें, बल्कि इसमें नई जान डालें और एक नई हलचल पैदा करें.
भौगोलिक दृष्टि से दूर और नजदीक के क्षेत्रों से हमारे मेहमान यहां आए हैं जिनका संबंध विभिन्न राष्ट्रीयताओं और पीढ़ियों से है और जो विभिन्न ऐतेक़ादी, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और विराषती पृष्ठभूमि वाले हैं, लेकिन जैसा कि आंदोलन के संस्थापकों में से ऐक , अहमद सोकारनो ने वर्ष 1955 के प्रसिद्ध बानडोंग बैठक में कहा था, गुट निर्पेक्ष (आंदोलन) के गठन का आधार भौगोलिक, जातीय और धार्मिक मेल नहीं बल्कि आवश्यकताओं की समानता है. इस समय गुट निर्पेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों को ऐसे आपसी संपर्क की ज़रूरत थी जो इन्हें जाह तलब, अहंकारी और कभी सैर न होने वाले नेटवर्क वर्कों के वर्चस्व से सुरक्षित रखे, वर्चस्ववादी संसाधन की प्रगति और विस्तार के बाद आज भी यह जरूरत अपनी जगह बाक़ी है.
मैं एक और तथ्य पेश करना चाहता हूँ;
इस्लाम ने हमें यह सबक दिया है कि जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक अप्रसार मेल के बावजूद मानव में समान सरिश्त है जो उन्हें पवित्रता, समानता, नेकी, सहानुभूति और सहकारिता की दावत देता है और यही सामान्य सरिश्त है जो गुमराह करने वाली भावनाओं से सुरक्षित पार कर जाने की सूरत में इंसानों को तौहीद और ज़ाति अक़दस इलाही की पहचान की दिशा में ले जाती है.
इस रौशन वास्तविक्ता में ऐसी असीम क्षमता है कि वह स्वतंत्र, सरबुलंद और ऐक साथ विकास और समानता से लैस समाज के गठन का आधार और सहायक बन सकती है, मानव तमाम भौतिक और दनियावी गतिविधियों को आध्यात्मिकता की रोश्नी प्रदान कर सकती और उख़्रवी स्वर्ग से पहले जिसका वादा इलाही धर्मों ने किया है दुन्यावी स्वर्ग निर्माण कर सकती है. यही सामान्य और संयुक्त सच है जो राष्ट्रों के ब्रादराना सहयोग का आधार करार पा सकते हैं जो प्रत्यक्ष शकल और श्माइल, अतीत के इतिहास और भौगोलिक स्थान के लिहाज़ से आपस में कोई समानता नहीं रखते.
जब इस तरह के आधार पर वैश्विक सहयोग क़ायम होगा तो सरकारें भय और खतरे, विस्तार पसंदी और एकतरफ़ा हितों के आधार पर नहीं और ज़मीर फ़रोश और ख़ाएन लोगों के माध्यम से नहीं बल्कि स्वस्थ संयुक्त हितों के आधार पर और उससे भी बालातर मानवता के हित के परिप्रेक्ष्य में आपसी संपर्क स्थापित करेंगे और अपने जागरूक आत्माओं व अपनी क़ौमों के दिलों को हर चिंता से निजात दिला सकती हैं.
यह आवश्यक प्रणाली उस वर्चस्व नीति प्रणाली के ठीक सामने बिंदु पर है कि पिछले सदियों के दौरान विस्तार पसंद पश्चिमी सरकारें और आज अमरीकी आक्रामक और अत्याचारी सरकार जिसका नेत्रत्व कर रही हैं और दावेदार है.
प्रिय महमानों!
छह दशक बीत जाने के बाद भी अभी तक गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के वास्तविक लक्ष्य अपनी जगह जीवित और स्थापित है.; अहंकार की समाप्ति, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता, शक्ति के बलाकों से निर्पेक्षता और सदस्य देशों के बीच आपसी वचन और सहयोग के विकास के लक्ष्य. दुनिया की समकालीन वास्तविकताओं और उन लक्ष्यों में अंतर बहुत अधिक है लेकिन तथ्यों से गुजरते हुए लक्ष्य तक पहुँचने का सामूहिक इरादा और वैश्विक प्रयास और कोशिश पुरख़तर लेकिन उम्मीद आवर और परिणाम सहित है.
निकट अतीत में हम शीत युद्ध के दौर की नीतियों और उसके बाद एकतरफा व्यवहार की हार के शाहिद रहे हैं. दुनिया इस ऐतिहासिक अनुभव से इबरत हासिल करते हुए एक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की ओर हरकत कर रही है और गुटनिर्पेक्ष आंदोलन (इस स्थिति में ) एक नई भूमिका निभा सकती है और ऐसा जरूर करना चाहिए. यह (नई) प्रणाली, सामान्य साझेदारी और देशों के समान अधिकार के आधार पर बनाया जाना चाहिए और आधुनिक प्रणाली की स्थापना के लिए संगठन के सदस्य देशों की एकता, प्रमुख समकालीन आवश्यकताओं में से एक है.
सौभाग्य से विश्व परिवर्तन का क्षितिज कुछ क़तबी प्रणाली की खुश खबरी दे रहा है जिसमें शक्ति के पारंपरिक महोरों की जगह, विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्रोतों से जुड़े विभिन्न देशों, संस्कृतियों और संस्कृतियों का एक संयोजन ले रहा है. यह आश्चर्यजनक परिवर्तन जिनको हम वर्तमान तीन दशकों के दौरान देखते आरहे हैं, स्पष्ट रूप से यह साबित करता है कि नई शक्तियों का उदय पुरानी शक्तियों के पतन के साथ होरहा है. सत्ता का यह हस्तांतरण गुटनिर्पेक्ष देशों को मौका देता है कि विश्व मैदान में प्रभावी और उचित भूमिका निभाऐं और धरती पर निष्पक्ष और सही मायने में शराकती प्रबंधन सिस्टम की ज़मीन हमवार करें. हम गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के सदस्य देश विचारों और प्रवृत्तियों के मतभेद के बावजूद संयुक्त लक्ष्य के संदर्भ में एक लंबे समय तक अपनी एकता और आपसी संपर्क को सुरक्षित रखने में सफल हुए हैं और यह कोई साधारण और छोटी सफलता नहीं है. यही हमारा संबंध निष्पक्ष और मानव दोस्ताना प्रणाली का आधार क़रार पा सकता है.
दुनिया की मौजूदा स्थिति गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के लिए शायद फिर हाथ न आने वाला मौका है. हमारा दृष्टिकोण यह है कि दुनिया के नियंत्रण कक्ष का अधिकार मुट्ठी भर पश्चिमी देशों की तानाशाही के चंगुल में नहीं होना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन मामलों के क्षेत्र में एक विश्व लोकतांत्रिक भागीदारी आविष्कार करने और सुनिश्चित करने की जरूरत है. यह उन सभी देशों की ज़रूरत है जो कुछ अत्याचारी और वर्चस्ववादी देशों के सीधे या परोक्ष हस्तक्षेप से नुकसान उठा रहे थे और आज भी नुकसान उठा रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना और उसका रूप ग़ैर तार्किक, गैर निष्पक्ष और सरासर अलोकतांत्रिक है. यह एक खुली हुई डेक्टीटरशिप, दकियानूसी, रद्द की हुई और ठुकराया हुआ सिस्टम है. इसी गलत प्रक्रिया का लाभ उठाते हुए अमेरिका और उसके हमनवा, शरीफाना मफ़ाहीम के लिबास में अपना ज़ुल्म दुनिया पर थोपने में सफल हुए. वह बात करते हैं मानवाधिकार लेकिन उनकी मुराद पश्चिमी हित होते हैं, वह बात करते हैं डेमोक्रेसी की लेकिन उसकी जगह विभिन्न देशों में सैन्य हस्तक्षेप के आधार हैं, वे बात करते हैं आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की लेकिन शहरों और दीहातों में रहने वाले निहत्थे लोगों को अपने बमों और हथियारों का शिकार बनाते हैं. उनके दृष्टकोंण से मानवता पहले, दूसरे और तीसरे दर्जे के नागरिकों में विभाजन है. एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के मानव की जानें बे कीमत और अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में (रहने वाले मनुष्यों की जान) बहुत कीमती करार दी जाती है. अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा महत्वपूर्ण जबकि शेष मानव सुरक्षा बे वक़अत समझी जाती है. तक्लीफ़ देना और हत्या अगर किसी अमेरिकी, सह्योनी या उनके गमाशतह लोगों के हाथों अंजाम पाए तो वैध और सक्रिय तरह अनदेखी है. उनकी खुफिया जेलें जो विभिन्न विपरीत महाद्वीपों में असहाय, वकील की सुविधा से वंचित और बिना किसी न्यायिक कार्रवाई के कैदियों से सबसे बुरे और नफरत भरे व्यवहार की गवाह हैं उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचातीं. अच्छे और बुरे की सराहना पूरी तरह एकतरफा और इम्तेयाज़ी होती है. वह अपने हितों को अंतरराष्ट्रीय नियमों का नाम देकर और अपनी अवैध और हाकिमाना बातों को विश्व समुदाय (की मांग) का नाम देकर देशों पर थोप देती हैं. अपने एकाधिकार वाले प्रबंधित मीडिया नेटवर्क द्वारा अपने झूठ को सच, बातिल को हक़ और अत्याचार को न्याय बनाकर पेश करती हैं और हर उस सच्चाई को जो उनके भ्रम को बरमला करती हो झूठ और हर सत्य मांग को विद्रोह का नाम दे देते हैं.
दोस्तो! यह नाक़िस और नुक़्सान वाली स्थिति जारी रहने के योग्य नहीं है. इस गलत विश्व सिस्टम से सब थक चुके हैं. अमरीका में धन और सत्ता के केंद्र के खिलाफ 99 प्रतिशत जनता आंदोलन और यूरोपीय देशों में जनता का अपनी सरकारों की आर्थिक नीतियों पर वैश्विक आपत्ति भी इस स्थिति से क़ौमों के धैर्य का पैमाना लबरेज हो जाने का संकेत है. इस गैर तर्कसंगत स्थिति का कोई समाधान खोजना चाहिए.
गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों की ऐकजुटता, तर्कसंगत और स्थिर संपर्क मार्ग समाधान की तलाश में बहुत प्रभावी हो सकता है.
प्रिय दर्शकों!
अंतरराष्ट्रीय शांति वर्तमान युग की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है और आम विनाश के खतरनाक हथियारों की समाप्ति तत्काल जरूरत और सामान्य मांग है. आज की दुनिया में सुरक्षा एक सामान्य गैर इम्तेयाज़ी ज़रूरत है. जो लोग अपने हथियार कोष्ठक मानवता विरोधी हथियारों से भर रहे हैं, खुद को विश्व शांति का अलमबरदार घोषित करने का अधिकार नहीं रखते. बिना संदेह यह (हथियार) उनको भी शांति और सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते. बड़े अफ़सोस की बात है कि आज यह देखने में आता है कि सबसे अधिक परमाणु हथियार रखने वाले देश अपनी सैनिक प्रणाली से इन घातक संसाधन को समाप्त करने का वास्तविक और गंभीर इरादा नहीं रखते बल्कि उन्हें खतरों के सद्द करने का स्रोत और अपनी राजनीतिक और वैश्विक साख का एक महत्वपूर्ण स्तर मानते हैं. यह कल्पना बिल्कुल गलत और अस्वीकार्य है.
परमाणु हथियार से न सुरक्षा प्राप्त होती है और न राजनीतिक शक्ति बढ़ती है बल्कि यह (हथियार) इन दोनों बातों के लिए खतरनाक है. वर्ष उन्नीस से नब्बे के दशक की घटनाओं से साबित हो गया कि इन हथियारों की मौजूदगी पूर्व सोवियत संघ जैसी सरकार को भी बचा नहीं सकती. आज भी हम ऐसे देशों को जानते हैं जो परमाणु बम के मालिक होने के बावजूद अशांति की चपेट में हैं.
ईरान परमाणु, रासायनिक और इसी तरह के अन्य हथियारों के इस्तेमाल को अक्षम माफी और महान पाप समझता है. हमने परमाणु हथियार मुक्त मध्यपूर्व का नारा बुलंद किया है और उसका पालन कर रहे हैं. (लेकिन) यह परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग और परमाणु ईंधन उत्पादन के पक्ष का त्याग कर जाने के अर्थ में नहीं होता. विश्व नियमों के आधार से इस ऊर्जा का शांतिपूर्ण इस्तेमाल सभी देशों का अधिकार है. सबको अपने देश और अपनी जनता की विभिन्न जीवन आवश्यकताओं के तहत इस साफ सुथरी ऊर्जा के उपयोग का अवसर मिलना चाहिए और इस अधिकार का अधिग्रहण दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए. कुछ पश्चिमी देशों जिनके पास परमाणु हथियार हैं और जो अवैध प्रक्रिया के दोषी हैं परमाणु ईंधन उत्पादन पर भी अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं. संदिग्ध कदम अंजाम दिए जा रहे हैं कि परमाणु ईंधन उत्पादन और बिक्री पर कुछ केन्द्रों की स्थायी एकाधिकार स्थापित हो जाऐ जिनके नाम तो अंतरराष्ट्रीय हों लेकिन वास्तव वह कुछ पश्चिमी देशों के पंजे में जकड़े हुए हूँ.
हमारे इस समय का तरफा तमाशा यह है कि अमेरिका जिसके पास सबसे अधिक मात्रा में बहुत घातक परमाणु हथियार और आम विनाश के अन्य हथियार हैं और उनका उपयोग करने वाला जो एकमात्र देश है, आज परमाणु अप्रसार का लीडर बनना चाहता है ! उन्होंने और उनके पश्चिमी दोस्तों ने ग़ासिब सह्योनी शासन को परमाणु हथियारों से लैस कर उसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए बहुत बड़े खतरे में बदल दिया है लेकिन मक्कारों की यही पार्टी स्वतंत्र देशों को परमाणु ऊर्जा शांतिपूर्ण प्रयोग करते हुऐ नहीं देखना चाहती. यहां तक कि परमाणु दवाओं और अन्य शांतिपूर्ण मानव लक्ष्य के तहत परमाणु ईंधन के निर्माण के लिऐ रूकावट बनने के लिए अपनी पूरी ताक़त का इस्तेमाल कर रही है. परमाणु हथियारों के निर्माण पर चिंता तो उनका झूठा बहाना है. ईरान के हवाले से उन्हें खुद भी पता है कि वह सरासर झूठ बोल रहे हैं! लेकिन जब राजनीति में आध्यात्मिक की जान बाकी न रह जाये तो वह झूठ को वैध करार दे देती है. इक्कीसवीं सदी में जो परमाणु धमकी दे और उस पर उसे शर्म भी नहीं आए क्या वह झूट बोलने से बचेगा या उस पर शर्म करेगा? !
मैं बल देकर कह रहा हूँ कि इस्लामी गणतंत्र पईरान रमाणु हथियारों को हासिल करने की कोशिश नहीं कर रहा है. साथ ही शांतिपूर्ण लक्ष्यों के तहत परमाणु ऊर्जा के उपयोग के अधिकार से कभी व किसी तरह अनदेखी नहीं करेगा. हमारा नारा है, "परमाणु ऊर्जा सब के लिए परमाणु हथियार किसी के लिए नहीं ". हम दोनों बातों में पूछताछ करते रहेंगे. हमें पता है कि परमाणु अप्रसार संधि के संदर्भ में परमाणु ईंधन उत्पादन पर कुछ पश्चिमी देशों की एकाधिकार का अंत सभी स्वतंत्र देशों मिनजुम्ला गुटनिर्पेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों के हित में है.
अमेरिका और उसके सहयोगियों के दबाव और जबरदस्ती के सामने सफल प्रतिरोध के तीन दशकों के अनुभव से इस्लामी गणतंत्र इस अंतिम विश्वास पर पहुँच चुका है कि एक संगठित और प्रतिबद्धता रखने वाली क़ौम का प्रतिरोध सभी मुखासमतों और दुश्मनियों पर बहुल पाने और उच्च लक्ष्य की ओर ले जाने वाला गर्व वाला रास्ता निर्माण करने में सक्षम है. पिछले दो दशकों में हमारे देश की सभी क्षेत्रों में विकास एक वास्तविकता है जो सबकी नज़रों के सामने है और इस पर नज़र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय औपचारिक संस्थानों ने बार बार स्वीकार किया है . यह सब प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और अमेरिका और सहयेनिज़्म से जुड़े चैनलों के ज़हर अफ़्शानियों की हालत में मिला है. प्रतिबंध, जिन्हें कुछ व्यर्थ बातें करने वाले, कमर तोड़ बता रहे थे, न केवल कमर तोड़ साबित नहीं हुई और न भविष्य में होंगी बल्कि उनकी वजह से हमारे कदम और स्थिर, हमारी हिम्मतें और भी बुलंद हुई हैं और अनुभवों का समायोजन, और अपनी जनता की आंतरिक ऊर्जा पर हमारी संतुष्टि और विश्वास और भी दृढ़ हो गया. हमने चुनौतियों का सामना करते समय नुसरत इलाही का दृश्य बार बार अपनी आँखों से देखा है.
महमानान गिरामी!
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे का उल्लेख करना चाहता हूँ. हालांकि इसका संबंध हमारे क्षेत्र से है लेकिन इसके व्यापक पहलुओं का दायरा क्षेत्र से बाहर तक फैल गया है और उसने दशकों से विश्व राजनीति को प्रभावित किया है. वह फ़िलिस्तीन की दर्दनाक समस्या है. इस समस्या का सारांश यह है कि एक स्वतंत्र और स्पष्ट ऐतिहासिक पहचान रखने वाला फ़िलिस्तीन नामक देश बीसवीं सदी के चालीस के दशक में ब्रिटेन के नेत्रत्व में वहशत नाक पश्चिमी साजिश के तहत शक्ति, हथियार, नरसंहार और धोखा और मक्कारी द्वारा उसकी (मालिक) मिल्लत से हड़प कर एक ऐसे दल को सौंप दिया गया जिसकी बहुमत को यूरोपीय देशों से प्रवास करवाके लाया गया था. यह गंभीर गासिबाना कार्रवाई जो शहरों और दिहातों में निहत्थे लोगों के नरसंहार, उनके घरबार से पड़ोसी देशों की ओर उनकी जबरन नक़्ले मकानी के साथ अंजाम पाई, छह दशकों से अधिक की इस अवधि में उन्हीं आपराधिक कार्रवाई के साथ बदस्तूर जारी है. यह मानव समाज की एक महत्वपूर्ण समस्या है. ग़ासिब सह्योनी शासन के राजनैतिक व सैनिक नेताओं ने इस समय में किसी भी अपराध के करने से परहेज़ नहीं किया है, मानव नरसंहार, उनके घरों और खेतों की तबाही, पुरुषों, महिलाओं यहाँ तक बच्चों की गिरफ्तारी और उन्हें दी जाने वाली ईज़ाओं से लेकर इस क़ौम की अवमानना और तहक़ीर, सह्योनी सरकार के हराम ख़ोरी के आदी आमाशय में इसे ख़त्म कर देने के प्रयासों और फ़िलिस्तीन और पड़ोसी देशों में उनके शिविरों पर हमलों तक जिनमें दसियों लाख की संख्या में आप्रवासियों शरण लिए हुए हैं, (किसी भी आपराधिक कार्रवाई से उन्होंने परहेज़ नहीं किया). सब्रा, शतीला, काना, देर यासीन आदि के नाम हमारे क्षेत्र के इतिहास में मज़लूम फिलिस्तीनी जनता के खून से लिखे गए हैं. आज 65 साल बाद अधिकृत क्षेत्रों में रह जाने वालों के खिलाफ सह्योनी दरिंदों की यही आपराधिक कार्रवाई अब भी अंजाम पा रही हैं. वह पे दर पे नए नए अपराध कर रहे हैं और क्षेत्र को एक नऐ संकट से जूझा रहे हैं. शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब युवकों की हत्या होने, घायल होने और गिरफ्तार कर लिए जाने के समाचार न आते हों जो देश की रक्षा और अपने सम्मान की प्राप्ति के लिए उठ खड़े हुए हैं और अपने घरों और खेतों की समाप्ति पर विरोध बुलंद कर रहे हैं. सह्योनी शासन जिसने विनाशकारी युद्धों की आग भड़का कर, मानव की हत्या आम करके, अरब क्षेत्र को हड़प कर और क्षेत्रीय एवं वैश्विक राज्य आतंकवाद का बाजार गर्म कर दसियों साल से हत्या और युद्ध और शरपसंदी की आग भड़का रखी है, फिलिस्तीनी राष्ट्र को जिसने अपने अधिकार प्राप्ति के लिए क़्याम किया है और संघर्ष कर रही है, आतंकवादी करार देती है और सह्योनिज़्म से जुड़े चैनल और कई बिके हुए पश्चिमी मीडिया भी अपनी नैतिक दायित्वों और मीडिया के सिद्धांतों का हनन करते हुए शुद्ध झूट को दोहराते हैं. मानवाधिकार के बुलंद बाँग दावे करने वाले राजनीतिक नेता भी इन सभी अपराधों पर अपनी आँखें बंद किए हुए हैं और किसी भी शर्म व हया को महसूस किए बिना, अलमिए लिखने वाली इस सरकार के समर्थक बने हैं और वकील और संरक्षक की भूमिका निभा रहे हैं.
हमारा दृष्टिकोण यह है कि फ़िलिस्तीन फिलिस्तीनी स्वामित्व है और इस पर अतिग्रहण का क्रम बहुत बड़ा और नाकाबिले बर्दाश्त अत्याचार और विश्व शांति और सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है. फ़िलिस्तीन के समाधान के लिए पश्चिम वालों और उनसे जुड़े लोगों ने जितनी भी सुझाव दिऐ हैं सब गलत और असफल साबित हुऐ है और आगे भी यही होगा. हम ने बहुत उचित और पूरी लोकतांत्रिक राहे हल पेश की है कि सभी फिलिस्तीनी चाहे वहाँ वर्तमान निवासी हों या वह लोग जिन्हें दूसरे देशों की ओर जबरन प्रवास करवा दी गई और जो अब तक अपनी फिलिस्तीनी पहचान स्थापित रखे है, वह मुसलमान हों, यहूदी या ईसाई, सब दक़ीक़ निगरानी में अंजाम पाने वाले संतोषजनक रायशुमारी में भाग ले और देश की राजनीतिक व्यवस्था के ढांचे का चयन करें, सभी फिलिस्तीनी जो वर्षों से बेवतनी का दुख झेल रहे हैं अपने देश लोटें और जनमत संग्रह और उसके बाद संविधान की परिवर्तन और चुनाव में भाग लें. तभी शांति क़ायम हो सकती है.
यहां अमेरिकी राजनेताओं को जो अभी तक हमेशा सह्योनी शासन के संरक्षक और सहायक के रूप में मैदान में उपस्थित रहे हैं, एक खैर खवाहाना सलाह देना चाहूँगा. इस सरकार ने अब तक आप के लिए बेशुमार दर्द सिर खड़े किए हैं , क्षेत्री राष्ट्रों में आप को घृणा पूर्वक और आप को उनकी आँखों में ग़ासिब सह्योनियों का अपराध भागीदार बनाकर पेश किया है. इन वर्षों के दौरान इस रास्ते पर चलने के कारण अमेरिकी सरकार और जनता को जो भौतिक और नैतिक घाटा उठाना पड़ा है वह सरसाम वाला है और शायद अगर भविष्य में भी यही रविश जारी रही तो और भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. आइए! जनमत संग्रह के लिए इस्लामी गणतंत्र के प्रस्ताव पर विचार करें और बहादुराना निर्णय से खुद को कभी नहीं हल होने वाली इस गुत्थी से मुक्त दिलाऐं! निश्चित, क्षेत्र की जनता और धरती के सभी स्वतंत्र चिंता व्यक्ति इस कदम का स्वागत करेंगे.
महमानान प्रिय!
एक बार फिर अपनी शुरुआती बातचीत की ओर पलटना चाहूंगा. दुनिया के हालात बहुत संवेदनशील हैं और दुनिया, प्रमुख महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ से गुज़र रही है. उम्मीद है कि एक नई प्रणाली जन्म ले रही है. गुटनिर्पेक्ष आंदोलन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दो तिहाई से अधिक सदस्य शामिल हैं जो भविष्य के हालात तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. तेहरान में इस महान बैठक का आयोजन ख़ुद भी बहुत बा अर्थ घटना है जिसे अनुमान और अंदाज़ों में ध्यान रखना चाहिए. हम इस आंदोलन के सदस्यों से अपनी व्यापक क्षमताओं और संभावनाओं के विकास के द्वारा दुनिया को अशांति, युद्ध और वर्चस्ववादी से निजात दिलाने के सिल्सिले में यादगार और ऐतिहासिक भूमिका निभा सकते हैं.
यह लक्ष्य आपस में हमारे हर जहती सहयोग से ही प्राप्त हो सकता है. हमारे बीच बहुत धनी और गहरा विश्व प्रभाव रखने वाले देशों की संख्या कम नहीं है. आर्थिक और मीडिया के क्षेत्र में सहयोग और आगे ले जाने और बुलंदियों पर पहुंचाने वाले अनुभव के तबादले के मामले में समस्याओं का समाधान निश्चित रूप से संभव हो जाएगा. हमें चाहिए कि अपने संकल्प और इच्छा को स्थिर करें, लक्ष्य के प्रति वफादार रहें, विस्तार पसंद शक्तियों के ग़ैज़ व गज़ब न डरें और उनकी मुस्क्राहटों के झांसे में न आएं, इरादऐ इलाही और सृष्टि के नियमों को अपना समर्थक समझें, दो दशकों पहले कम्युनिस्ट दलों की हार और मौजूदा दौर में पश्चिम की तथाकथित उदारवादी डेमोक्रेसी की नीतियों की हार को, जिसके आसार यूरोपीय देशों और अमेरिका की सड़कों पर और इन देशों के अर्थव्यवस्थाओं को दर पेश हल न होने वाली समस्याओं के रूप में सबके सामने हैं, इबरत की नज़र से देखें. और अंतिम बात यह कि उत्तरी अफ्रीका में अमरीका पर निर्भर और सह्योनी शासन के सहायक आमिरों के सरंगोनी और क्षेत्र के देशों में फैली इस्लामी जागरूकता को हमें बहुत बड़ा अवसर समझना चाहिए. हम विश्व प्रबंधन में गुटनिर्पेक्ष आंदोलन की राजनीतिक भूमिका को बढ़ावा देने के बारे में विचार कर सकते हैं, प्रबंधन प्रणाली में परिवर्तन लाने के लिए एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के परिवर्तन और जारी करने के संसाधन प्रदान कर सकते हैं, हम प्रभावी आर्थिक सहयोग की ओर प्रगति की योजना और अपने बीच सांस्कृतिक संपर्क के नमूनों को निर्धारित कर सकते हैं. एक सक्रिय और लक्षित सेक्रेटरेयट का गठन उन लक्ष्यों की प्राप्ति में बहुत प्रभावी और उपयोगी हो सकती है.
मैं (आप सभी का) आभारी हूँ.
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