
पवित्र कुरान में कई मामलों में इंसानों के परीक्षण की बात कही गई है। पहला सवाल जो मन में आता है वह यह है कि क्या परीक्षण का उद्देश्य अस्पष्ट और अज्ञात व्यक्तियों या चीजों को जानना और हमारी अज्ञानता के स्तर को कम करना नहीं है? यदि यह मामला है, तो ईश्वर, जिसका ज्ञान सब कुछ कवर करता है और हर किसी और हर चीज के आंतरिक और बाहरी रहस्यों को जानता है, अपने अनंत ज्ञान से आकाश और पृथ्वी की अनदेखी जानता है, वह परीक्षण क्यों करता है, मगर उससे कुछ छिपा है कि परीक्षा से ज़ाहिर हो?!
इसके उत्तर में यह कहना चाहिए कि ईश्वर के विषय में परीक्षण एवं इम्तेहान की अवधारणा हमारे परीक्षणों से भिन्न है। मानव परीक्षण अधिक ज्ञान के लिए और अस्पष्टता और अज्ञानता को दूर करने के लिए होते हैं, लेकिन इलाही परीक्षण वास्तव में "शिक्षा" व तर्बियत है। यह समझाते हुए कि कुरान में बीस से अधिक परीक्षाओं की निस्बत ईश्वर की ओर दी गई हैं, यह ईश्वर का एक सामान्य नियम और स्थायी परंपरा है, जिसका उपयोग छिपी हुई प्रतिभाओं को निखारने (और उन्हें शक्ति से कार्य में लाने) के लिए किया जाता है और, परिणामस्वरूप, अपने सेवकों का पालन-पोषणकरने के लिऐ परीक्षण करता है।, अर्थात्, जिस प्रकार स्टील को मजबूत बनने के लिए भट्टी में डाला जाता है, उसी प्रकार भगवान भी व्यक्ति को कठिन घटनाओं की भट्टी में पालते हैं ताकि वह प्रतिरोधी बन सके।
गौरवशाली क़ुरआन ने इस तथ्य को कुरान में कहा है और कहता है, «وَ لِيَبْتَلِيَ اللَّهُ ما فِي صُدُورِكُمْ وَ لِيُمَحِّصَ ما فِي قُلُوبِكُمْ وَ اللَّهُ عَلِيمٌ بِذاتِ الصُّدُورِ» जो कुछ तुम्हारे सीनो में है वह आज़माऐगा ता कि तुम्हारे दिल ख़ालिस हो जाऐं और वह तुम्हारे छुपे हुऐ राज़ों को जानता है(अल-इमरान-154)।
अमीरुलमोमनीन, अली, अ.स., के पास ईश्वरीय परीक्षणों के दर्शन के क्षेत्र में एक बहुत ही सार्थक परिभाषा है। वह कहते हैं: و إن كان سبحانه اعلم بهن من انفسهم و لكن لتظهر الافعال التى بها يستحق الثواب و العقاب:"यद्यपि ईश्वर अपने सेवकों की आत्माओं के बारे में उनसे अधिक जागरूक है, वह उन्हें जानता है। वह प्रयास करता है कि अच्छे और बुरे कर्म जो पुरस्कार और दंड के मानदंड हैं, उनमें से प्रकट हों।
अर्थात् किसी व्यक्ति के आंतरिक गुण ही पुरस्कार और दण्ड की कसौटी नहीं हो सकते, सिवाय इसके कि जब वह मानवीय कार्यों के सामने प्रकट हो, उसके पुरस्कार और दण्ड के पात्र हों। यदि ईश्वरीय परीक्षण नहीं होता तो ये प्रतिभाएँ विकसित नहीं होतीं और मानव अस्तित्व का वृक्ष अपनी शाखाओं पर कर्मों का फल नहीं दिखाता और यही इस्लामी तर्क में ईश्वरीय परीक्षण का दर्शन है।
तफ़सी नमूना, खंड 1, पृष्ठ 526 से लिया गया