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क़ुरआन के सूरे/41

सूरए "फुस्सेलत" के अंदर कुरान में कोई बदलाव ना होने पर ज़ोर

15:06 - November 21, 2022
समाचार आईडी: 3478116
तेहरान (IQNA): इतिहास में कुरान में कोई बदलाव और तहरीफ़ ना होना मुसलमानों के अक़ीदों में से एक है। इस आधार पर, पवित्र क़ुरआन वही है जो इस्लाम के पैगंबर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम) पर उतारा गया था और इसमें एक भी शब्द जोड़ा या घटाया नहीं गया है। और यह कुरान के चमत्कारों में से एक है।

पूरे इतिहास में कुरान में कोई बदलाव और तहरीफ़ ना होना मुसलमानों के अक़ीदों में से एक है। इस आधार पर, पवित्र क़ुरआन वही है जो इस्लाम के पैगंबर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम) पर उतारा गया था और इसमें एक भी शब्द जोड़ा या घटाया नहीं गया है। और यह कुरान के चमत्कारों में से एक है।

कुरान के 41 वें सूरह को "फुस्सेलतفُصّلَت" कहा जाता है। 54 आयतों वाला यह सूरा कुरान के पारा नंबर 24 और 25 में शामिल है। सूरए फुस्सेलत मक्की सूरौं में से एक है और 61 वां सूरह है जो इस्लाम के पैगंबर पर नाजिल हुआ था।

"फुस्सेलत" शब्द का अर्थ है "साफ बयान हुआ"। इस शब्द का अर्थ "अलग-अलग" या "फसल फसल" के रूप में भी बयान किया गया है। इस सूरे की तीसरी आयत में इस शब्द का ज़िक्र है और इसीलिए इस सूरे को इस नाम से जाना जाता है।

सूरए फुस्सेलत क़ुरआन से काफिरों के दूर होने के बारे में अधिक बात करता है। इस विषय को इस सूरे के विभिन्न भागों में दोहराया गया है। सूरे की शुरुआत में, वह छह आयतों तक किताब को नकारने के मुद्दे का जिक्र करता है, फिर आयत 26 में दोबारा इसी बात का जिक्र करते हुए फरमाता है: 

«وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَا تَسْمَعُوا لِهَذَا الْقُرْآنِ وَالْغَوْا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ: 

और जिन लोगों ने इनकार किया, उन्होंने कहा, "इस कुरान को मत सुनो और इसमें गलत बातें डाल दो, शायद तुम जीत जाओ।»

फिर 40 वीं आयत में तीसरी बार इसी बात का जिक्र करता है: 

«إِنَّ الَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِي آيَاتِنَا لَا يَخْفَوْنَ عَلَيْنَا أَفَمَنْ يُلْقَى فِي النَّارِ خَيْرٌ أَمْ مَنْ يَأْتِي آمِنًا يَوْمَ الْقِيَامَةِ اعْمَلُوا مَا شِئْتُمْ إِنَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ: 

जो लोग हमारी आयतों [समझने और पेश करने] में भटक जाते हैं वह हम से छिपे नहीं हैं, क्या वह बेहतर है जो आग में डाला जाएगा या वह जो क़यामत के दिन शांति के साथ आएगा, जो कुछ तुम चाहो करो, क्योंकि वह देखता है कि तुम क्या करते हो।»

और सूरे के आखिर में एक मर्तबा फिर कुरान के ख़ुदाई होने के बारे में जिक्र आता है: 

قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ كَانَ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُمْ بِهِ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ: 

मुझे बताओ, अगर [कुरान] अल्लाह की तरफ से आया हो और आपने इसे अस्वीकार कर दिया है, तो उस व्यक्ति से ज्यादा गुमराह कौन होगा जो लंबी और दूर की मुख़ालेफ़त में आया है(फुस्सेलत / 52)।

कुरान मैं किसी तरह का कोई बदलाव ना आना या कुरान की अस्थिरता, आम मुसलमानों की आस्थाओं में से एक है, जिसके आधार पर उनका मानना ​​​​है कि मुसलमानों के हाथों में जो कुरान है वह बिल्कुल वही है जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम के ऊपर नाज़िल हुआ और उसमें न तो कुछ जोड़ा गया है और न ही घटाया गया है।

किसी भी प्रकार की तहरीफ़ और बदलाव को नकारने के लिए मुफस्सिरों और मुतकल्लिमों ने कुछ आयतों और कुछ हदीसों का हवाला दिया है। इन आयतों में सूरह फुस्सेलत की आयतें 41 और 42 शामिल हैं।

इस सूरे के अंदर और दूसरी बातें जो आई हैं वह इस तरह हैं:

अल्लाह के एक होने का मसला, रसूले खुदा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम की नबूव्वत, कुरान का नाजिल होना और उस की सिफात व विशेषताएं, कयामत और उसके अहवाल, दोज़ख़ के लोगों के खिलाफ खुद उनकी आंख, कान और सभी अंग की गवाही और और आद और समूद की कौम का इतिहास।

 

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