IQNA-क़ुरआन करीम हज को अल्लाह का मनुष्यों पर एक अधिकार बताता है, जो उन लोगों पर अनिवार्य है जो अल्लाह के घर (काबा) तक पहुँचने की सामर्थ्य रखते हैं। यह न केवल एक इबादत (उपासना) है, बल्कि सच्चे ईमान का प्रतीक भी माना गया है।

क़ुरआन करीम सूरह आल-ए-इमरान (97) में फरमाता है: «فِيهِ آيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَقَامُ إِبْرَاهِيمَ وَمَنْ دَخَلَهُ كَانَ آمِنًا وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا ۚ وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ» "इसमें खुली निशानियाँ हैं, इब्राहीम का स्थान (मक़ामे इब्राहीम) और जो कोई इसमें दाखिल हो जाए, वह अमन में हो जाएगा। और अल्लाह का लोगों पर इस घर का हज करना है, उसके लिए जो वहाँ तक पहुँचने की सामर्थ्य रखता हो। और जो इनकार करे, तो निश्चय ही अल्लाह संसार से बेपरवाह है।"
यह आयत स्पष्ट करती है कि हज के रिवाज़ को पूरा करना समर्थ लोगों पर एक ईश्वरीय दायित्व है। "इस्तिताअत" (सामर्थ्य) शब्द केवल आर्थिक पहलू तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शारीरिक क्षमता, मार्ग की सुरक्षा, स्वास्थ्य और हज से लौटने के बाद जीवनयापन की संभावना भी शामिल है। आयत के अंत में "और जो इनकार करे, तो निश्चय ही अल्लाह संसार से बेपरवाह है" कहकर यह याद याद दिलाया गया है कि जानबूझकर हज छोड़ना एक प्रकार का कुफ्र (अवज्ञा) और अल्लाह के आदेश की अवहेलना है।
इस आयत में हज न करने को "कुफ्र" (अविश्वास) से जोड़ा गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार, इस आयत में "कुफ्र" उस व्यक्ति के लिए है जो हज की अनिवार्यता को ही नकारता हो, जिससे वह इस्लाम से बाहर हो जाता है। वहीं, कुछ का मानना है कि हज न करना (भले ही उसके साथ हज की अनिवार्यता का इनकार न हो) इस्लाम की सीमा से बाहर निकलना है। कुछ अन्य विद्वानों का कहना है कि "कुफ्र" शब्द हर प्रकार के सत्य के विरोध को शामिल करता है, हालाँकि इसकी अलग-अलग डिग्रियाँ और स्तर हैं, जिनके अपने विशेष नियम हैं।
कुछ मुफस्सिरीन (व्याख्याकारों) के अनुसार, "आयाते बय्यिनात" (स्पष्ट निशानियाँ) का उल्लेख करके, पिछली आयत के साथ यहूदियों को जवाब दिया गया है, जो बैतुल-मुक़द्दस को काबा से अधिक महिमावान मानते थे। क़ुरआन ने यहूदियों के आपत्तियों के जवाब में पिछली आयत में काबा के कुछ विशेषाधिकार गिनाए हैं और इस आयत में "स्पष्ट निशानियों" को जोड़ा है। इस आयत के अनुसार, अल्लाह के घर की स्पष्ट निशानियों में मक़ामे इब्राहीम, उसमें प्रवेश करने वालों की सुरक्षा और समर्थ लोगों पर हज की अनिवार्यता शामिल हैं।
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