ग़ुलाम रज़ा Noor mohammadi,तेहरान विश्वविद्यालय के इल्मी संकाय के सदस्य ने ईरानी कुरान समाचार एजेंसी (IQNA) के साथ एक साक्षात्कार में अपमानजनक धारावाहिक "मावियह, हसन और हुसैन [अ.स.]पर कहाःइस सीरियल को दो तरीके़ से हम जांच कर सकते हैं पहली धारणा इस तरह है कि इस तरह के काम को साज़िश के रूप में हम देखें और दूसरी नज़र यह है कि इस काम को केवल एक ऐतिहासिक कथा के रूप में बयान करें.
उन्होंने कहा: लेकिन हम वास्तव में जो देख रहे हैं और यह महत्वपूर्ण है कि यह एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक तहरीफ़ है और इस तरह के कामों को "मुख़्तानामे"या अन्य घरेलू ऐतिहासिक श्रृंखलाओं के बराबर नहीं लाना चाहिऐ.
IRIB इस्लामी अनुसंधान केंद्र अध्ययन की शिक्षा के पूर्व निदेशक,ने इस श्रृंखला के बनाने के उद्देश्य को इस तरह समझायाः "मावियह, हसन और हुसैन [अ.स.]" धारावाहिक के माध्यम से यह कहना चाहते हैं कि शिया एक झूटा संप्रदाय है जो कि अब्दुल्ला नामित एक यहूदी सबा द्वारा बनाया गया है, अन्यथा वास्तव में इस्लाम के शुरू में शिया फ़िरक़े का वजूद नहीं हैं.
तेहरान विश्वविद्यालय के इल्मी संकाय के सदस्य ने इसमें इज़ाफ़ा किया:इस धारावाहिक में इमाम हसन और इमाम हुसैन(अ.स)के चेहरे को चित्रित करना महान अपमान है जो मुसलमानों के हक़ में किया है क्योंकि शियाओं के अलावह, सुन्नियों के यहां भी, अहलेबैत (अ.) के चेहरे को चित्रित करने का विरोध किया गया है.
उन्हों ने इस तरह की घटनाओं पर कैसे प्रतिक्रिया ब्यक्त कीजाऐ के सवाल के जवाब में कहाःइन उत्पादों की निंदा केवल शिया और सुन्नी संस्थाओं तक संक्षिप्त नहीं रहना चाहिए बल्कि सबसे पहले इस्लामी देशों के सम्मेलन के रूप में बड़ी संस्था,और Qom सेमिनरी व.. . द्वारा निंदा की जानी चाहिए.
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