तेहरान (IQNA) मिस्र के डॉक्टर और क़ारी सलाह अल-जमल ने मिस्र के दक़हलीया प्रांत के आवीश अल-हजर गाँव से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि हासिल करने तक अपने क़ुरआनी जीवन की कहानी साझा की।
इक़ना ने मिसरावी के हवाले से बताया कि कम उम्र में क़ुरआन याद करना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस यात्रा में मिलने वाली बरकतों ने उन्हें अपनी चिकित्सा शिक्षा को पवित्र क़ुरआन की सेवा के साथ जोड़ने में मदद की।
अल-जमल ने नाफे अल-तरास के साथ सैटेलाइट चैनल शम्स के कार्यक्रम ‘शहरी और अधिकारी’ में बातचीत करते हुए बताया कि उन्होंने 10 वर्ष की उम्र में अपने गाँव आवीश अल-हजर में पूरा क़ुरआन याद कर लिया था और 11 वर्ष की उम्र में मिस्र में दूसरा स्थान हासिल किया।
उन्होंने बताया कि उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1995 में आया, जब वे रमज़ान की रातों में नमाज़ पढ़ाने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। वहाँ अप्रत्याशित रूप से उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय क़ुरआन तिलावत प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने विश्व स्तर पर प्रथम स्थान हासिल किया।
मिस्र के इस क़ारी ने बताया कि इस सफलता ने उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोल दिए। इसके बाद वे मिस्र से बाहर रमज़ान की रातों में नमाज़ पढ़ाने के लिए लगातार यात्राएँ करने लगे और रेडियो क़ुरआन पर उनके लाइव प्रसारण के कारण उनका नाम व्यापक रूप से पहचाना जाने लगा।
उन्होंने बताया कि मिस्र लौटने के बाद सरकार ने उनका सम्मान किया और उनके लिए मिस्र के रेडियो के दरवाज़े खोल दिए। उन्होंने रेडियो की परीक्षाओं में भाग लिया और पहली ही कोशिश में सफल रहे। इसके बाद रेडियो समिति ने उन्हें स्वर, उच्चारण और आवाज़ के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने का प्रशिक्षण दिया। इसके बाद अल्लाह की किताब की सेवा के लिए उनकी रेडियो यात्रा शुरू हुई।
अल-जमल ने कहा कि उनकी वैज्ञानिक और पेशेवर शिक्षा उनके क़ुरआनी जीवन के रास्ते में बाधा नहीं बनी। उन्होंने काहिरा मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया और सात वर्ष बाद स्नातक की पढ़ाई पूरी कर जनरल सर्जरी में विशेषज्ञता हासिल की। इसके बाद उन्होंने काहिरा के इमबाबा क्षेत्र में अपना क्लिनिक खोला।
इस डॉक्टर-क़ारी ने बताया कि चिकित्सा और अपने पेशे में व्यस्त रहने के बावजूद उनका क़ुरआन से संबंध कभी समाप्त नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि वे स्वयं को क़ुरआन का एक प्रेमी मानते हैं, न कि व्यावसायिक अर्थ में एक पेशेवर क़ारी। अपनी पढ़ाई और पेशेवर जिम्मेदारियों के बावजूद वे नियमित रूप से दैनिक क़ुरआन तिलावत करते हैं।
अल-जमल ने चिकित्सा और क़ुरआन को साथ लेकर चलने की अपनी दिनचर्या के बारे में बताया कि वे अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार रात के समय को नमाज़ के लिए समर्पित करते हैं और प्रतिदिन तीन से चार पारे क़ुरआन की तिलावत करते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका जीवन यह दिखाता है कि व्यक्ति एक से अधिक क्षेत्रों में सफलता हासिल कर सकता है, बशर्ते वह अपने लक्ष्य पर कायम रहे और अपने समय का सर्वोत्तम उपयोग करे।
सलाह अल-जमल ने कहा कि क़ुरआन, चिकित्सा शिक्षा, पेशा और रेडियो सेवा—ये सभी उनके जीवन का हिस्सा रहे हैं।
आगे सलाह अल-जमल की क़ुरआन तिलावत का वीडियो प्रस्तुत है।
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