IQNA

17:11 - August 21, 2026
समाचार आईडी: 3485733

दोहरी अज़ान: इस्तांबुल की मस्जिदों में चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा

तेहरान (IQNA) इस्तांबुल के ऐतिहासिक शहर के केंद्र में स्थित आया सोफ़िया और सुल्तान अहमद मस्जिद ने उस्मानी दौर से चली आ रही एक प्रमुख ध्वनि परंपरा ‘आपसी अज़ान’ या ‘दोहरी अज़ान’ को आज भी सुरक्षित रखा है।

इक़ना ने तुर्क प्रेस के हवाले से बताया कि  इस ऐतिहासिक परंपरा में दोनों मस्जिदों के मुअज़्ज़िन बारी-बारी से अज़ान के हिस्से पढ़ते हैं। इससे ऐसा दृश्य और वातावरण बनता है, जिसमें धार्मिक भावना के साथ इस्तांबुल की ऐतिहासिक विरासत भी जुड़ जाती है।

इस परंपरा में एक मस्जिद का मुअज़्ज़िन अज़ान का एक हिस्सा शुरू करता है और उसके बाद दूसरी मस्जिद का मुअज़्ज़िन उसी हिस्से को दोहराता है। इसी तरह दोनों मुअज़्ज़िन बारी-बारी से अज़ान पूरी करते हैं। इससे आवाज़ों में एक विशेष सामंजस्य बना रहता है और पास-पास स्थित मीनारों से आने वाली आवाज़ों में अव्यवस्थित टकराव नहीं होता।

तुर्की के धार्मिक स्रोत इस परंपरा को ‘दोहरी अज़ान’ कहते हैं। इसमें मूल रूप से दो मुअज़्ज़िनों के बीच बारी-बारी से अज़ान पढ़ने की शैली अपनाई जाती है। यह परंपरा आज भी पाँचों दैनिक नमाज़ों के समय आया सोफ़िया और सुल्तान अहमद मस्जिद के बीच निभाई जाती है और मुअज़्ज़िनों की आवाज़ इस्तांबुल के ऐतिहासिक प्रायद्वीप में गूँजती है।

तुर्की मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, पहला मुअज़्ज़िन अज़ान का एक हिस्सा पढ़ता है और तुरंत सामने वाली मस्जिद का मुअज़्ज़िन उसी वाक्य को दोहराता है। यह परंपरा उस्मानी दौर से विरासत में मिली है।

ऐतिहासिक रूप से अज़ान की यह आपसी शैली उस्मानी शाही मस्जिदों की परंपराओं से जुड़ी हुई है, विशेष रूप से उन मस्जिदों से जिनमें कई मीनारें होती थीं। इस्तांबुल में आया सोफ़िया और सुल्तान अहमद मस्जिद के बीच होने वाली यह परंपरा इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बन गई है।

दोनों मस्जिदों में यह परंपरा आज भी कायम है और शाही मस्जिदों से जुड़ी धार्मिक विरासत को सदियों से संरक्षित किए हुए है। 17वीं शताब्दी में आया सोफ़िया के सामने सुल्तान अहमद मस्जिद के निर्माण के बाद इस परंपरा ने एक विशिष्ट रूप ले लिया।

इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों के बीच स्थित मैदान भी तब से इस्तांबुल की दृश्य और धार्मिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है। अज़ान के समय दोनों आवाज़ें एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करतीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक बनती हैं।

इस क्षेत्र में पहले भी अलग-अलग धार्मिक संगीत के मकाम, जैसे मकाम हुसैनी, का इस्तेमाल करते हुए दोहरी अज़ान पढ़े जाने के उदाहरण सामने आए हैं। इस तरह उस्मानी दौर से चली आ रही अज़ान की यह अनूठी परंपरा आज भी जीवित है।

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